मैं बचपन से ही जरा समझदार सी थी,
अक्सर मेरे पसंद के खिलौने
ज्यादा रोने वाले बच्चों को दे दिये जाते थे,
और मैं फिर भी मुस्कुरा देती,
छोटी-छोटी खुशियों में खुश हो जाया करती थी
बचपन से ही कोई ज्यादा ख्वाहिश नहीं रही मेरी।
मगर
मेरी दादी अक्सर मुझे डांटती थी,
और कहती थी,
कि हर बात पे हंस देना कोई
अच्छी बात नहीं है।
मुझे नहीं पता,
वो एेसा क्यूं कहती थी,
शायद,
वो मुझे स्त्रियों की "मर्यादा"बतातीं थी,
या उसे मालूम था,
की ज्यादा "हंसने "वालो के
हिस्से में ही आती है,
सबसे ज्यादा "पीड़ा।"

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