Sunday, January 8, 2023

Love Poetry

 

आज बेहद ज़रूरी थी मुझे तुम्हारी,
आज फिर मायूसी ने मुझे घेर रखा था।
ऐसा लग रहा था,
मानो ज़िन्दगी ने मुझे सदियों
से कही और ही उलझा रखा था

अजीब सी कशमकश थी दिल में
और सन्नाटा कही भीतर बैठा था।

थकान सी होने लगी थी जिंदगी से अब,
जैसे जिंदगी ने हर वक़्त मुझे
ख्वाबो के पीछे भगा रखा था।

आज बेहद ज़रूरी थी मुझे तुम्हारी
और तुमने भी हाथ छुड़ा रखा था।

न देते तुम साथ उम्र भर का,
कम से कम पल दो पल का साथ ही दे देते,
फक्त हर ख़्वाब मैंने तुमसे ही सजा रखा था।

सुनो,
मैंने दिल्लगी भी तुमसे की थी,
और इश्क भी तुमसे ही किया।
इसी अस्बाब (कारण) से मैंने
हर उम्मीद-ए-वफ़ा भी तुमसे किया।

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