पता है तुम्हें,
जब मैंने तुम्हें पहली दफा देखा था, तो बस देखती ही रह गई थी।
सर्द हवाएँ, चिड़ियों की चाहचाहट, लहलहाते पेड़,पहाड़ों से गिरते झड़ने, आती-जाती रेलगाड़ियां ,मेरी धड़कन और सांसे,सब जैसे एक पल के लिए ठहर सा गया था ,"सब कुछ।"
पेड़ से झड़ते फूल जहां के तहां, हवा में रुके थे, पहाड़ों से गिरते झड़ने, चिड़ियों की आवाजें,एक पल के लिए सब थम सा गया था ।
"जैसे तुमने आते ही मेरे पलकों पर वक्त रख दिया हो" और वह सब वहीं का वहीं ठहरा गया हो मेरी पलकों पे
तुमने पूछा भी था मुझसे,
अरे! अब देख क्या रही हो इतने दिनों से कह रही थी मिलना है मिलना है आज सामने हुं तो कुछ बोलोगी नहीं क्या?
जब मैंने बस मुस्कुरा कर तुम्हारा जवाब दिया था, तुमने भी मुझे देख मुस्कुरा दिया ऐसा लगा जैसे तुम मेरे अंदर चल रहे उलझे एहसासों को महसूस कर रहे थे।
मगर सच कहूं मैं तुम्हें बताना चाहती थी कि मैं उस वक्त क्या महसूस कर रही थी
पता है उस दिन मैं घंटों पहले ही स्टेशन पे बैठे हैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी, आती-जाती ट्रेनों की आवाजों से लगता है कि बस अब तुम ही आ रहे हो।
पता है तुम्हारे आने से पहले मैंने कितना कुछ सोच रखा था, कि तुम कब आओगे तो मैं तुमसे क्या-क्या बातें करूंगी ,क्या सवाल होंगे और तुम उसके क्या जवाब दोगे और मैं फिर उस पर कोई सवाल कर दूंगी,
सवालों की जैसे लंबी लिस्ट बना ली थी मैंने।
उस रोज मैं बार- बार अपनी घड़ी देखती तो कभी स्टेशन पर लगी घड़ी,ऐसा लग रहा था जैसे दोनों में से कोई भी घड़ी मुझे तुम्हारे आने वाला वक्त दिखा दे,मगर शायद जब किसी का इंतजार होता है तो वक्त भी जरा नजाकत से गुजरने लगती बिलकुल धीरे धीरे।
और फिर वह पल आया जब तुम मेरे सामने थे और सब कुछ किसी ख्वाब सा लग रहा था "सब कुछ" थमा हुआ "मैं ,वक्त , प्रकृति,सब कुछ मेरे लिए मेरा पूरा ब्रह्मांड।
उस वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे तुम्हारे पास दौर के आऊं, और गले से लग जाऊँ,तुम्हारे होठों को चूम कर कह दुं तुम्हें की मुझे तुमसे कितना प्रेम है
मगर ये सच था कोई फिल्म नहीं,
फिर तुमने जैसे ही आवाज़ दी एकाएक सब अपने पहले की अवस्था में आ गया,मेरी धड़कने तेज चलने लगी ,सब कुछ चलने लगा था बहुत तेजी से, शायद वक्त भी ,
तुम आए फिर 2 दिन बाद तुम चले भी गए और मैं अब तक तुमसे कुछ कह नहीं पाई ,जो मैं कहना चाहती थी कि मुझे तुमसे कितना प्रेम है
मुझे ऐसा लग रहा था तुम्हारा आना जाना जैसे कोई गहरा सपना था जो मैं खुली आंखों से देख रही थी।
तुम चले गए थे मगर मैं अब भी शायद उसी स्टेशन अब तक ठहरी हुई थी तुम्हारे स्मृतियों के साथ।
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