Tuesday, January 10, 2023

Hindi love story chapter -05

 

जानती हूं तुम बड़े मशरूफ रहते हो अपने कामों में, तुम्हें वक्त का भी पता नहीं चल पाता। एक जिम्मेदार बेटे ,भाई, दोस्त और एक जिम्मेदार नागरिक होने का कर्तव्य सब निभाना होता है तुम्हें।
मुझे यह भी पता है कि तुम मुझे चोट या पीड़ा नहीं पहुंचाना चाहते, मगर कुछ पल का ही सही थोड़ा वक्त निकाल कर किसी दिन लौट आना।
कुछ ना सही कम से कम
तुम बस इतना तो समझो की कोई तुम्हारे इंतजार में तुम्हारी राह दिन-रात देखते रहता है तुम्हें देखने भर के लिए ही कोई लड़की सारे काम छोड़ कर जो दौड़ी चली आती है।
जो लड़की नंगे पैर कदम नहीं रखती थी जमीन पर,
आज वो तुम्हारी प्रतीक्षा में कंकड़ों के चुभने के बाद भी खड़ी खड़ी दीवार पर सिर टिकाए तुम्हारी राह ताकती रहती है।
दरवाजे पर किसी की भी दस्तक हो ,वो सबसे पहले उठ कर दरवाजा खोलती है ,सोचती है इस बार शायद तुम लौट आए होगे ।
मगर नहीं,
फिर से दरवाजे पर कोई और होता है और वह लड़की जो चहक कर दरवाजा खोलने गई थी, वो अब मुरझाई सी अपने कमरे की खिड़की पर वापिस जाकर बैठ जाती है।

वह इसी सोच में अपना दिन-रात गवां देती है कि न जाने और कितने वर्ष तुम्हारा इंतजार करेगी वो, तुम उसके पास लौट कर आओगे भी या नहीं?
उसने न जाने कितने खत कितनी ही कविताएं लिखी हैं
जिसके पिता तुम थे क्योंकि उन कविताओं की जननी वो है मगर बीज तुम्हारा ही बोया हुआ है प्रेम से लेकर विरह तक का ।
आज पूर्णमासी की रात थी वो बैठे-बैठे तुम्हारा इंतजार कर रही थी। रात के करीब 1:00 बजे सन्नाटा इतना की हवाओं के चलने की आवाज में भी महसूस हो रही थी।
तभी दरवाजे के खटखटाने की आवाज आई वो दौड़ पड़ी बेतहाशा दरवाजे तक,
उसके लिए मानो कमरे से घर के मुख्य द्वार की दूरी न जाने कितने दिनों की लंबी दुरी प्रतीत हो रही थी।
वह बदहवास होकर दौर पड़ी ,उसे इतना भी ध्यान ना रहा कि उसने अपने शरीर पर दुपट्टा तक ना धरा था ।
उसे तो बस तुमसे मिलने की छटपटाहट थी ,
न जाने कितने वर्षों की प्रतीक्षा लिए थी वो अपने भीतर।

दौड़ते दौड़ते हैं वो अचानक टकराकर गिर पड़ी,
अपने आंगन में लगे हरश्रृंगार के वृक्ष के नीचे।
वो जैसे ही उठने लगी ,उसने उसे देखा जिससे वह टकराकर गिर पड़ी थी वह देखते ही चौंक पड़ी ।
उसने खुद को जमीन में पड़ा हुआ बेसुध देखा
जो अब मृत पड़ी हुई थी ,उसकी आंखें खुली दरवाजे पे टिकी हुई थी जैसे उसक मृत शरीर भी उसकी ही राह देख रहा था,उसकी लाश अब सड़ने लगी थी जिससे अब दुर्गंध आ रही थी।
मगर न जाने कितने दिनों से हरसिंगार के फूल उस पर बरस रहे थे।
उसके बदन पे हर रोज अपनी कोमलता बिखेर रहें थे,
वो प्रतिक्षा कर रही लड़की अब लाश हो चुकी थी।

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