लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि अश्वेत,
तुम यूं आकाश में क्या ताकती रहती हो?
कभी देख कर मुस्कुराती हो ,
तो कभी झर झर आंसू बहाती हो,
कभी शांत बैठ जाती हो,
तो कभी बातें करती हो अकेले आकाश से
कोई रहता है क्या वहां,
जो तुम इतने प्रेम से निहारती हो,
आखिर तुम आकाश में क्या ताकती हो?
-पता है तुम्हें?
इस सवाल का जवाब मैं कभी नहीं दे पाई किसी को,
मेरे पास कोई शब्द नहीं होते जिससे मैं बयान कर सकूं
कि आखिर मैं क्या देखती हूं।
बस मुझे इतना पता है कि
मैं जब जब आकाश कि तरफ देखती हूं
मुझे तुम नज़र आते हो,उन बादलों में जो अनेकों चित्र उकेरती हैं आकाश की गोद में,
उस गहरे नीले रंग में ,मै तुम्हें महसूस कर पाती हुं,और कभी कभी तो तुम मुझे अथाह सागर से लगने लगते हो, जिसमें मैं डुब कर हर बार नयी सी हो जाती हूं।
मेरे ह्रदय के स्पनदन में,
मेरी सांसों में मुझे तुम महसूस होते हो।
समस्त निहारिकाएं एवं सहस्र चंद्रमा
दिखते हैं मुझे मेरे मस्तक में,
सूर्य जैसे मुझमें न जाने कितनी ही उर्जा भरने लग जाते हैं
रौशनी से लबालब मेरी आंखें करुणामई हो जाती हैं।
नदियां कल कल कर मेरी नसों में बहने लगती हैं
और
हजारों प्रेमरूपी वृक्ष उग आतें हैं जो प्रेम कि वर्षा अनायास ही करने लग जाते हैं।
और मैं तुम्हें ख़ुद में महसूस करने लगती हूं,
तब मैं "मैं" नहीं रह पाती
अक्सर "तुम "हो जाती हूं,
तब
मेरे लिए समस्त संसार शुन्य हो जाता है
मेरा अस्तित्व तुममें विलीन हो जाता है और संसार से मेरा मोह एकाएक भंग होने लगता है और तुमसे प्रेम बढ़ने लगता है
हे ईश्वर,
तुम एेसा करो तुम खुद ही प्रकट हो जाओ,
तुम्हारे बारे में बता पाना असम्भव सा है,
और मैं भाषा की इतनी गुणी भी नहीं।
मेरी बहुत कोशिशों के बावजूद मैं असफल रही
मुझमें इतना सामर्थ्य कहां है
कि तुमहारा बखान भी कर सकूं।
-अश्वेत

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