Saturday, January 14, 2023

Hindi Depression Poetry

 


कुछ दिनों से अजीब सा सन्नाटा
मेरे भीतर चीखता रहता है।

कुछ अनसुलझी सी ख्वाहिशें
किसी अनजाने से डर की गोद में
गोद में पल रही होती हैं
जो भूख से बौखला कर
नोंच खाती है मुझे।

वो हर वक्त दरवाजा खटखटाती रहती हैं
मेरे मन के तहखानों का।

उसकी इच्छा है कि
दरवाज़ा टूट जाए और
चाहत आजाद होकर उड़ने लगे
अपने पंखों को फैलाकर
खुले आसमान के नींचे।

मगर दरवाजा खुल भी जाए तो
डर चाहत के पांव खींचकर
उसे फिर से वही पटक देती है
किसी कोने में,
और वो फिर से हो जाती है
किसी मृत के समान।

ये कौन सी चाहत है
ये कैसा डर है ,
क्या है जो अब भी
खाली पड़ा है?

मुझे नहीं पता,

मगर कुछ तो है
जो अंदर सब कुछ तबाह कर रहा है
और मेरी चाहत किसी बेवा
की तरह बस सफेद होती जा रही है।

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