मैं तुम्हें हासिल कर लूं ऐसी कोई ख्वाहिश कभी थी ही नहीं मेरी।
मैंने तो बस तुमसे प्रेम किया था
"अथाह प्रेम"इसके अलावा कुछ भी नहीं।
मुझे नहीं पता तुम कैसे हो क्या हो,
तुममें कितने गुण हैं या कितने अवगुण,
मैंने तो बस तुमसे प्रेम किया है।
मुझे तो यह भी नहीं पता,
तुम मुझे चाहते हो या नहीं,
मगर
इस बात को जानने की भी
जरूरत कभी महसूस नहीं हुई मुझे,
क्योंकि ,
मुझे तुमसे प्रेम करने मात्र से
ही सभी सुख मिल जाते हैं।
मैंने तो बस तुम्हें चाहा है तुम्हारे
भीतर के उस कोमल से मन को जो
कई सख़्त परतों के भीतर दुबक कर बैठा है।
जिसे मैंने अपने आंचल में पनाह दे दी
और तुम्हारा कोमल सा मन
आज भी खेलता है मेरे भीतर।
मैंने समेट लिया तुम्हें खुद में ताकि मेरा
ममत्व जिंदा रह सके मुझमें,
मेरे शून्य हो जाने तक।
तुम आओ और अपनी सभी पीड़ाएं
मुझे दे दो और सुकून पाओ मेरी गोद में।
तुम्हारे सुकून से मुझे भी तृप्ति की अनुभूति होगी।
मैं तुम्हारी सारी पीड़ाएं ग्रहण कर लूंगी अपने भीतर,
जैसे शिव करते हैं ग्रहण विष को,
प्रकृति को रक्षा के लिए।
-अश्वेत
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